Friday, 20 January 2012

Mr. विजय v/s Mr. पराजय or How I Become Positive ?


                           David J. Schwartz की लिखी हुई किताब ,” The Magic of Thinking Big” पढ़ते हुए  हमारे  दिमाग में  एक बात आई की, हमारा दिमाग विचारों का निर्माण करने वाली एक फैक्ट्री है . इसमें हर वक़्त कोई ना कोई thought बनती रहती है. और इस काम को कराने के लिए हमारे पास दो बड़े ही आज्ञाकारी सेवक हैं और साथ ही ये अपने काम में माहिर भी हैं . आप कभी भी इनकी परीक्षा ले लीजिये ये उसमे सफल ही होंगे . आइये इनका परिचय कराती  हूँ-, पहले सेवक का नाम है- Mr. Triumph या मिस्टर विजय, दुसरे सेवक का नाम है- Mr. Defeat या मिस्टर पराजय, Mr . विजय का काम है आपके आदेशानुसार positive thoughts का निर्माण करना. और Mr. पराजय का काम है आपके आदेशानुसार negative thoughts का निर्माण करना.... और ये सेवक इतने निपुण हैं कि ये आपके इशारे के तुरंत समझ जाते हैं और बिना वक़्त गवाएं अपना काम शुरू कर देते हैं.,
                           Mr. विजय इस बात को बताने में महारत हासिल  हैं कि आप कोई भी काम  कैसे  कर सकते हैं?, आप क्यों सफल हो सकते हैं?  जबकि, Mr. पराजय इस बात को बताने में महारत हासिल हैं कि आप  कोई भी काम  क्यों नहीं कर सकते हैं?,आप क्यों असफल हो सकते हैं?, जब आप सोचते हैं कि मेरी life क्यों अच्छी है तो तुरंत Mr. विजय इस बात को सही साबित करने के लिए आपके दिमाग में positive thouhts produce करने लगते है, जो आपके अब तक के जीवन के अनुभवों से निकल कर आती है . जैसे कि-, मेरे पास इतना अच्छा परिवार है., मुझे चाहने वाले कितने सारे अच्छे लोग हैं ., मैं well settled हूँ, financially इतना सक्षम हूँ कि खुश रह सकूँ ., मैं जो करना चाहता हूँ वो कर पा रहा हूँ. etc., इसके विपरीत जब आप सोचते हैं कि मेरी life क्यों अच्छी नहीं है ,तो तुरंत Mr. पराजय इस बात को सही साबित करने के लिए आपके दिमाग में negative thoughts produce करने लगते है. जैसे कि-, मैं अपनी life में अभी तक कुछ खास नहीं achieve कर पाया, मेरी नौकरी मेरी काबलियत के मुताबिक़ नहीं है, मेरे साथ हमेशा बुरा ही होता है.etc., ये दोनों सेवक जी जान से आपकी बात का समर्थन करते हैं . अब ये आपके ऊपर depend करता है कि आप इसमें से किसकी services लेना चाहते हैं ....... इतना याद रखिये कि इनमे से आप जिसको ज्यादा काम देंगे वो उतना ही मजबूत होता जायेगा और एक दिन वो इस फैक्ट्री पर अपना कब्ज़ा कर लेगा, और धीरे-धीरे दुसरे सेवक को बिलकुल निकम्मा कर देगा.अब आप को decide करना है कि आप किसका कब्ज़ा चाहते हैं- मिस्टर विजय का या मिस्टर पराजय का?,
                          यदि life को improve करना है तो जितना अधिक हो सके thoughts produce करने का काम Mr. विजय को ही दीजिये . यानि positive self talk कीजिये . नहीं तो अपने आप ही Mr. पराजय अपना अधिकार जमा लेंगे., मैंने कई बार is simple but effective technique का use किया है. मैं अपने thoughts पर हमेशा नज़र रखती  हूँ और जैसे ही negative thoughts का production बढ़ने लगता है मैं तुरंत Mr. विजय को काम पर लगाने की शुरुआत कर देती  हूँ, यानि मैं कुछ ऐसे statements खुद से बोलती  हूँ जो positive thoughts की chain बना देते हैं और मैं वापस  अपने    track पर आ जाती  हूँ......         जैसे जब मुझे लगता है कि मेरी personal relationships में तनाव आ रहा है तो मैं खुद से बोलती  हूँ कि भगवान  आपने ने मुझे कितना प्यार करने वाले लोग दिए हैं...... और बस आगे का काम मिस्टर विजय कर देते हैं. वो personal relationships से related मेरे सुखद अनुभव को मेरे सामने गिनाने लगते हैं और कुछ ही देर में मेरा मूड बिलकुल सही हो जाता है. और जब mood सही हो जाता है तो वो मेरे actions में भी reflect करने लगता है.फिर तो सामने वाला भी ज्यादा देर तक नाराज़ नहीं रह पाता और जल्द ही सारी खटास निकल जाती है और फिर सब अच्छा लगने लगता है...........,
                           Thoughts को positive रखने का ये एक बहुत ही practical तरीका है. बस आपको जब भी लगे कि आपके ऊपर negativity हावी हो रही है तो तुरंत उस विचार के विपरीत विचार मन में लाइए. जैसे कि यदि आपके मन में विचार आता है कि आप काबिल नहीं हैं तो तुरन्त इसका उल्टा प्रश्न Mr. विजय से कीजिये कि ,” Mr. Vijay बताइए मैं काबिल क्यों हूँ?” और आप पायेंगे कि आपका ये सेवक आपके सामने उन अनुभवों को रखेगा जिसमे आपने कुछ अच्छा किया हो, जैसे...आपने कभी कोई prize जीता हो, किसी की मदद की हो, कोई ऐसी कला जिसमे आप औरों से बेहतर हों,etc., बस इस बात का ध्यान रखियेगा कि आप स्वयं से जो प्रश्न कर रहे हैं वो सकारात्मक हो नकारात्मक नहीं. ........., आप भी इसे आजमा  कर के देखिये. अपने thoughts पर नज़र रखिये , और जब आपको लगे कि मिस्टर पराजय कुछ ज्यादा ही सक्रीय हो रहे हैं तो जल्दी से कुछ positive self talk कीजिये और मिस्टर विजय को काम पर लगा दीजिये.और फिर देखिये आप उसका 
परिणाम ...................
                             Thanks . I hope it works for you.

Monday, 16 January 2012

मुझे वहीं ठहर जाना था...................

कसम से तुम्हारी बहुत याद आती है, जितना तुम समझते हो और जितना मैं तुमसे छिपाती हूँ उससे कहीं ज्यादा. मैं अक्सर तुम्हारे चेहरे की लकीरों को तुम्हारे सफहों से मिला कर देखती हूँ कि तुम मुझसे कितने शब्दों का झूठ बोल रहे हो...तुम्हें अभी तमीज से झूठ बोलना नहीं आया. तुम उदास होते हो तो तुम्हारे शब्द डगर-मगर चलते हैं. तुम जब नशा करते हो तो तुम्हारे लिखने में हिज्जे की गलतियाँ बढ़ जाती हैं...मैं तुम्हारे ख़त खोल कर पढ़ती हूँ तो शाम खिलखिलाने लगती है.

वो दिन बहुत अच्छे हुआ करते थे जब ये अजनबीपन की बाड़ हमारे बीच नहीं उगी थी...इसके जंग लगे लोहे के कांटे हमारी बातों के तार नहीं काटा करते थे उन दिनों. ठंढ के मौसम में गर्म कप कॉफ़ी के इर्द गिर्द तुम्हारे किस्से और तुम्हारी दिल खोल कर हंसी गयी हँसी भी हुआ करती थी. लैम्पोस्ट पर लम्बी होती परछाईयाँ शाम के साथ हमारे किस्सों का भी इंतज़ार किया करती थी. तुम्हें भी मालूम होता था कि मेरे आने का वक़्त कौन सा है. किसी को यूँ आदत लगा देना बहुत बुरी बात है, मैं यूँ तो वक़्त की एकदम पाबंद नहीं हूँ पर कुछ लोगों के साथ इत्तिफाक ऐसा रहा कि उन्हें मेरा इंतज़ार रहने लगा एक ख़ास वक़्त पर. मुझे बेहद अफ़सोस है कि मैंने घड़ी की बेजान सुइयों के साथ तुम्हारी मुस्कराहट का रिश्ता बाँध दिया और मोबाईल की घंटी का अलार्म.

वक़्त के साथ परेशानी ये है कि ये हर शाम वहीं ठहर जाता है...मैं घड़ी को इग्नोर करने की पुरजोर कोशिश करती हूँ पर यकीन मानो मेरे दोस्त(?) मुझे भी उस वक़्त तुम्हारी याद आती है. कभी कभी छटपटा जाती हूँ पूछने के लिए...कि तुम ठीक तो हो...तुम्हारा कहना सही है, तुम्हारी फ़िक्र बहुत लोगों को होती है...इसी बात से इस बात की भी तसल्ली कर लेती हूँ कि जो लोग तुम्हारा हाल पूछते होंगे वो वाकई तुम्हारा ध्यान रखेंगे, मेरी तरह दूर देश में बैठ कर ताना शाही नहीं चलाएंगे. मुझे माफ़ कर दो कि मैंने बहुत सी शर्तें लगायीं...बहुत से बंधन बांधे... तुम कहीं बहुत दूर आसमानों के देश के हो, मुझे जमीनी मिटटी वाली से क्या बातें करोगे. मैं खामखा तुम्हें किसी कारवां की खूबसूरत बंजारन से शादी कर लेने को विवश कर दूँगी कि इसी बहाने तुम कहीं आस पास रहोगे.

तुम आसमानों के लिए बने हो मेरे दोस्त...अच्छा हुआ जो हमारी दोस्ती टूट गयी. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके लिए दो लम्हा भी रुका जाए...कई बार तो मुझे अफ़सोस होता है तुम्हारा वक़्त जाया करने के लिए. तुम्हारी जिंदगी में बेहतर लोग आ सकते थे...बेहतर किताबें हो सकती थीं, बेहतर रचनायें लिखी जा सकती थीं. तुम उस वक़्त का जाहिर तौर से कोई बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे...तुम्हारे दोस्त कुछ बेहतर लोग होने चाहिए...मैं नहीं...मैं बिलकुल नहीं. तुम कोई डिफेक्टिव पीस नहीं हो कि जिसे सुधारा जाए...मैं तुम्हें बदलते बदलते तोड़ दूँगी, मैं अजीब विध्वंसक प्रवृत्ति की हूँ.

तुम्हें पता है लोग कब कहते हैं की 'मुझसे दूर रहो'?
जब उन्हें खुद पर विश्वास नहीं होता...जब वो इतने कमजोर पड़ चुके होते हैं कि खुद तुमसे दूर नहीं जा सकते...तब वे चाहते हैं कि तुम उनसे दूर चले जाओ.


आज बशीर बद्र का एक शेर याद आया तुम्हारी याद के साथ...
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है 


मैं तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँ, थोड़ी मुश्किल है...पर जानते हो न, बहुत जिद्दी हूँ...ये भी कर लूंगी. 

हाँ, एक बात भूल गयी...

तुम मुझसे दूर ही रहो!

Sunday, 8 January 2012

Kaha tha na k......................................

Kaha tha na k u sotey
huey chor k mat
jana,mujhey besak
jaga dena.tumhe
rishta bdalna
hai.meri hadd se niklna h ai....
tumhe kis baat ka
darr tha?mai tumhe
jane nahi deta.kahi
pe kaid kr leta.arey
pagal pyar me jbardasti nahi
hoti.jise rasta bdalna
ho ushey rasta
bdalne se,jise hadd
se niklna ho ushey
hadd se niklne se.na koi rok paya hai na
rok payega.to tumhe
kis baat ka darr tha?
mujhey besak jga
deti to mai tumko
dekh he leta.tumhe koi dua deta.km se
km u na hota.mere
7thi pr ye hakikat hai
tumhare baad khone
k liye kuch b baki
nahi.magar mai khone se darta
hu,mai ab sone se
darta hu..........
kaha tha na u
mujhey sota chor k
mat jana......................................

Friday, 30 December 2011

इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ ......

                    आज इस भीड़ भरी दुनिया में भी हर  शख्स अकेलेपन का शिकार सा है ...आखिर क्यों है ऐसा आज हमारे पास भौतिक जगत की सारी सुविधाये है ..भगवान के दिए हुए माता पिता भाई बहन और बाकि रिश्तेदार भी है ..फिर भी हर दूसरा व्यक्ति अकेलेपन की समस्या से ग्रसित है ......
.                .इसके कारण शायद हम खुद ही है आज का इन्सान इतना ज्यादा भौतिकतावादी हो गया है की उसके पास अपनों के पास बैठने के लिए समय ही नहीं ..न ही वो माता पिता को समय दे पता है न ही परिवार के अन्य सदस्यों को...और तो और आज की माताये भी अपने बच्चो को पूरा समय नहीं दे पाती
और न ही उनके पिता आज आधुनिक युग में बच्चो की परवरिश उनके आयाओ के भरोसे पे हो रही है ......
                आखिर क्यों हम अपने माता पिता को समय नहीं दे पाते.......हम अपने बच्चो के साथ क्यों उनका बचपना नहीं जी पाते जैसे   हमारे माता पिता हमारे साथ जीते थे ...हम उन्हें भौतिक जगत की सारी चीज़े दे रहे है बस अपना अमूल्य समय ही नहीं दे रहे जिसके कारण वो उन संस्कारो से वंचित हो जा रहे है ..जो हम उन्हें जाने अनजाने दे देते ..जो उन्हें विरासत में उनके दादा दादी दे देते ....
              आज हम ये भूल जाते है की जो आज हम अपने बच्चो को जाने अनजाने दे रहे है वही कल हमे ब्याज के साथ वापिस मिलने वाला है ...हम बच्चो
 के भावनात्मक विकास को अवरूध कर रहे है .कही न कही..आज कभी हम परेशान होते है की हमारे साथ कोई भी नहीं है लेकिन क्या हम कभी ये देखते है हम किसी के साथ कभी थे  या है की नहीं ...
              .आज हम अपनों के लिए समय न होने का रोना रोते है तो कल उनके पास हमारे लिए समय कहा से आएगा ......

Thursday, 29 December 2011

भ्रष्टाचार...........भारत सहित दुनिया भर में सबसे गंभीर मुद्दा...........

    भ्रष्टाचार रोकने के लिए जन लोकपाल बिल लाने की माँग करते हुए अन्ना हज़ारे का आंदोलन दोबारा शुरू हो गया है. मगर कई लोगों को ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार भारत में जड़ें जमा चुका है और उसे हटाना आसान काम नहीं होगा.

भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में लोग बातें करना और भाषण देना बहुत पसंद करते हैं लेकिन व्यवहार में कुछ भी नहीं बदलता. भ्रष्टाचार से निबटने के बारे में भी सैकड़ों सुझाव सामने आते रहते हैं.
   
    भ्रष्टाचार शब्द एक ऐसा तिलिस्म सा बनता जा रहा है जिसे रोक पाना किसी भी सरकार के लिए असंभव सा बनता जा रहा है.भ्रष्टाचार की मुख्य जड़ उसके अंदर छिपी हुई अभिलाषा है.जब तक इंसान अपनी सोच और आवश्यकता नहीं बदलेगा तक दुनिया का कोई भी क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा. इसलिए अब ऐसे सार्थक लोकपाल बिल की दरकार है जिसके मार्फ़त भ्रष्ट तत्वों पर कानूनी शिकंजा कसा जा सके. देश में भ्रष्टाचार एक ऐसा रोग बन गया है जिसका इलाज अब कानून बनाए बिना होने वाला नहीं है
    .भ्रष्टाचार हाथ पर हाथ रखकर बैठने से तो ख़त्म नहीं होगा या हम ऐसा सोचे कि कोई फ़रिश्ता आएगा और भ्रष्टाचार समाप्त करेगा.ऐसा कभी नहीं होगा.इसे ख़त्म करने के लिए किसी ना किसी को पहल करनी होगी और अगर किसी ने पहल नहीं की तो हम कुछ नहीं कर सकते हैं.
     भ्रष्टाचार का मतलब बारूदी सुरंग वाले क्षेत्र में फॅस जाने जैसा है एक कदम हिलाया नहीं कि विस्फोट में जान गॅवाना या विकलांग होना ही है। इसलिए किसी भ्रष्टाचारी को तिहाड में भेजकर न तो खुश होने जैसी कोई बात है और न ही इससे संतोष किया जा सकता है.भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देना और लड़ना अलग अलग बात है अगर आप किसी को रिश्वत लेते हुए या देते हुए देखते हैँ उसके खिलाफ जोखिम लेकर साक्ष्य एकत्र करते हैँ और जाँच मेँ अगर अधिकारी पूछता है न तो आप से ली गयी न आपने दी है तो आपको क्या परेशानी है हू आर यू. अपने पैसे और समय खर्च करने के बाद ऐसे सवाल बहुत तकलीफ देते हैँ...
      उन कारणों का पहचान कर ठीक करना होगा जिसके कारण लोग भ्रष्टाचारी होते जा रहे है.
सबसे बड़ी बात है भ्रष्टाचार विरोधी चर्चा का होना. चर्चा से जागरूकता बढ़ती है. हर व्यक्ति अगर बरबस भ्रष्टाचार विरोधी चर्चा एवं जागरूकता को अपनी जीवनशैली मे शामिल कर लेगा तो भ्रष्टाचार अपने आप कम हो जाएगा.
     भ्रष्टाचार एक ऐसी बुराई है जिसे जड़ से मिटाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. भारत में जबतक लोगों को जागरुक नहीं किया जाएगा तब तक इसे ख़त्म करना असंभव है.शोध एवं विरोध से काफ़ी हद तक भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है
     

Sunday, 18 December 2011

aap apne phasle jitni jaldi ho sake le le.......


जल्द फैसला लेने वालों के लिए खुशखबरी है. एक शोध का दावा है कि जल्दी निर्णय लेने वाले लोग ज्यादा खुश रहते हैं बजाये उनके जो जिंदगी में अहम पड़ाव पर निर्णय के बारे में जूझते रहते हैं.
अध्ययनकर्ताओं को पता चला है कि ज्यादा देर से निर्णय लेने वाले ज्यादा दुखी और परेशान रहते हैं, जबकि तुरंत फैसला लेने वाले चिंतामुक्त तो रहते ही हैं बेहतर जिंदगी भी जीते हैं.
‘डेली मेल’ की खबरों के मुताबिक, अध्ययनकर्ताओं ने दो समूहों में बांटकर लोगों का अध्ययन किया. एक में ऐसे लोगों को रखा गया जो हर चीज को लेकर परेशान रहते हैं, जबकि दूसरे समूह में ऐसे लोग थे जो निर्णय लेने के प्रति शंकालु नहीं रहते.
उन्होंने दावा किया कि दुविधा की स्थिति में फंसे रहने वाले लोग ज्यादा परेशान रहते हैं. उनके अनिर्णय के कारण ‘सहयोगी’ यानि ‘गर्लफ्रैंड’ या ‘ब्ऑयफ्रेंड’ का साथ छूटने का डर से लेकर कैरियर पर असर और स्वास्थ्य को भी इससे नुकसान पहुंचता है.
शोध को लेकर प्रोफेसर जोएस एरीलिंगर ने कहा कि नौकरी के लिए आवेदन करने, साथी का चुनाव, घर खरीदने या ऐसे ही किसी अहम पड़ाव पर जल्द फैसला नहीं लेने वाले लोग अधिक ‘नर्वस’ रहते हैं.

Saturday, 10 December 2011

घर से निकलने से पहले कुछ मीठा जरुर खाना चाहिए, क्योंकि..

कहा जाता है कि किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले मुंह मीठा करना चाहिए, कोई मिठाई या दही, शकर खाना चाहिए। यह परंपरा भी पुराने समय से ही चली आ रही है। आज भी कई लोग घर से निकलने के पूर्व कुछ मीठा खाते हैं।

हम जब भी किसी परीक्षा या किसी शुभ कार्य के लिए घर से निकलते हैं तो हमारे बुजुर्ग कुछ मीठा खाकर जाने की बात कहते हैं। आखिर इससे फायदा क्या होता है?

ऐसा माना जाता है मीठा खाकर कुछ भी कार्य करने से हमें सफलता मिलती है। मीठा खाने से हमारा मन शांत रहता है। हमारे विचार भी मिठाई की तरह ही मीठे हो जाते हैं। हमारी वाणी में मिठास आ जाती है। यदि हमारा मन किसी दुखी करने वाली बात में उलझा हुआ है और हम मीठा खा लेते हैं तुरंत ही मन प्रसन्न हो जाता है। मीठा खाने के बाद हम किसी भी कार्य को ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं। 

साथ ही घर से निकलते समय मीठा खाने से हमारे सभी नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं और हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कुछ लोग दही और शकर खाकर किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत करते हैं। दही में खटास होती है और शकर में मिठास। इस खट्टे-मीठे स्वाद से हमारा मन तुरंत ही दूसरे सभी बुरे विचारों से हट जाता है। मीठा खाने से रक्त संचार बढ़ जाता है। एनर्जी मिलती है।

शुभ कार्य के पहले मीठा खाना चाहिए परंतु ज्यादा मीठा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।